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काण्ड 7

उत्तरकाण्ड

131 पाठ के अंश · श्लोक, चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद

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शब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं। विद्वान की समीक्षा बाकी है।

16,385 / 16,386 शब्दों के AI अर्थ उपलब्ध

218 / 218 क्रमांकित दोहा / सोरठा के पूरे शब्दार्थ उपलब्ध

विषय-सूची

131

प्रसंग पुस्तक की विषय-सूची से हैं। पृष्ठों से मिलान अनुमानित है; एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं। दोहा / सोरठा की संख्या मूल पाठ से ली गई है।

01पाठ संदर्भ मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 905–906मंगलाचरणदोहा / सोरठा: इस अंश में नहींश्रीगणेशाय नमः।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी02पाठ संदर्भ 7.1 · पुस्तक पृ. 906–907भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्ददोहा / सोरठा 1 (क), 1 (ख)2/2 के शब्दार्थरहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी03पाठ संदर्भ 7.2 · पुस्तक पृ. 907–908भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्ददोहा / सोरठा 2 (क), 2 (ख)2/2 के शब्दार्थदेखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी04पाठ संदर्भ 7.3 · पुस्तक पृ. 909–910भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्ददोहा / सोरठा 3 (क), 3 (ख), 3 (ग)3/3 के शब्दार्थहरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी05पाठ संदर्भ 7.4 · पुस्तक पृ. 910–911भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्ददोहा / सोरठा 4 (क), 4 (ख)2/2 के शब्दार्थइहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी06पाठ संदर्भ 7.5 · पुस्तक पृ. 911–912भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्ददोहा / सोरठा 51/1 के शब्दार्थआए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी07पाठ संदर्भ 7.6 · पुस्तक पृ. 913श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्ददोहा / सोरठा 6 (क), 6 (ख)2/2 के शब्दार्थभरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी08पाठ संदर्भ 7.7 · पुस्तक पृ. 914–915श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्ददोहा / सोरठा 71/1 के शब्दार्थसासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी09पाठ संदर्भ 7.8 · पुस्तक पृ. 915–916श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्ददोहा / सोरठा 8 (क), 8 (ख)2/2 के शब्दार्थलंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी10पाठ संदर्भ 7.9 · पुस्तक पृ. 916–917श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्ददोहा / सोरठा 9 (क), 9 (ख)2/2 के शब्दार्थकंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी11पाठ संदर्भ 7.1 · पुस्तक पृ. 917श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्ददोहा / सोरठा 10 (क), 10 (ख)2/2 के शब्दार्थप्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी12पाठ संदर्भ 7.11 · पुस्तक पृ. 918श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्ददोहा / सोरठा 11 (क), 11 (ख), 11 (ग)3/3 के शब्दार्थअवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी13पाठ संदर्भ 7.12 · पुस्तक पृ. 919राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुतिदोहा / सोरठा 12 (क), 12 (ख), 12 (ग)3/3 के शब्दार्थप्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी14पाठ संदर्भ 7.13 · पुस्तक पृ. 921–923राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुतिदोहा / सोरठा 13 (क), 13 (ख)2/2 के शब्दार्थजय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी15पाठ संदर्भ 7.14 · पुस्तक पृ. 923–924राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुतिदोहा / सोरठा 14 (क), 14 (ख)2/2 के शब्दार्थजय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी16पाठ संदर्भ 7.15 · पुस्तक पृ. 925राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुतिदोहा / सोरठा 151/1 के शब्दार्थसुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी17पाठ संदर्भ 7.16 · पुस्तक पृ. 926वानरोंकी और निषादकी विदाईदोहा / सोरठा 161/1 के शब्दार्थबिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी18पाठ संदर्भ 7.17 · पुस्तक पृ. 926–927वानरोंकी और निषादकी विदाईदोहा / सोरठा 17 (क), 17 (ख)2/2 के शब्दार्थसुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी19पाठ संदर्भ 7.18 · पुस्तक पृ. 927–928वानरोंकी और निषादकी विदाईदोहा / सोरठा 18 (क), 18 (ख)2/2 के शब्दार्थसुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी20पाठ संदर्भ 7.19 · पुस्तक पृ. 928–929वानरोंकी और निषादकी विदाईदोहा / सोरठा 19 (क), 19 (ख), 19 (ग)3/3 के शब्दार्थभरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी21पाठ संदर्भ 7.2 · पुस्तक पृ. 930रामराज्यका वर्णनदोहा / सोरठा 201/1 के शब्दार्थपुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी22पाठ संदर्भ 7.21 · पुस्तक पृ. 930–931रामराज्यका वर्णनदोहा / सोरठा 211/1 के शब्दार्थदैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी23पाठ संदर्भ 7.22 · पुस्तक पृ. 931–932रामराज्यका वर्णनदोहा / सोरठा 221/1 के शब्दार्थभूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी24पाठ संदर्भ 7.23 · पुस्तक पृ. 932–933रामराज्यका वर्णनदोहा / सोरठा 231/1 के शब्दार्थफूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी25पाठ संदर्भ 7.24 · पुस्तक पृ. 933–934रामराज्यका वर्णनदोहा / सोरठा 241/1 के शब्दार्थकोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी