काण्ड 6
लङ्काकाण्ड
122 पाठ के अंश · श्लोक, चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद
शब्दार्थ के साथ पढ़ना शुरू करें →शब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं। विद्वान की समीक्षा बाकी है।
14,372 / 15,382 शब्दों के AI अर्थ उपलब्ध
149 / 154 क्रमांकित दोहा / सोरठा के पूरे शब्दार्थ उपलब्ध
विषय-सूची
122प्रसंग पुस्तक की विषय-सूची से हैं। पृष्ठों से मिलान अनुमानित है; एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं। दोहा / सोरठा की संख्या मूल पाठ से ली गई है।
01पाठ संदर्भ मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 771–772मंगलाचरणदोहा / सोरठा: इस अंश में नहींश्रीगणेशाय नमः।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→02पाठ संदर्भ 6.1 · पुस्तक पृ. 772–773मंगलाचरणदोहा / सोरठा 11/1 के शब्दार्थयह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→03पाठ संदर्भ 6.2 · पुस्तक पृ. 773–774नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापनादोहा / सोरठा 21/1 के शब्दार्थसैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→04पाठ संदर्भ 6.3 · पुस्तक पृ. 774–775नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापनादोहा / सोरठा 31/1 के शब्दार्थजे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→05पाठ संदर्भ 6.4 · पुस्तक पृ. 775–776नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापनादोहा / सोरठा 41/1 के शब्दार्थबाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→06पाठ संदर्भ 6.5 · पुस्तक पृ. 776–777श्रीरामजीका सेनासहित समुद्र पार उतरना, सुबेल पर्वतपर निवास, रावणकी व्याकुलतादोहा / सोरठा 51/1 के शब्दार्थअस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→07पाठ संदर्भ 6.6 · पुस्तक पृ. 777–778रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाददोहा / सोरठा 61/1 के शब्दार्थनिज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→08पाठ संदर्भ 6.7 · पुस्तक पृ. 778–779रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाददोहा / सोरठा 71/1 के शब्दार्थनाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→09पाठ संदर्भ 6.8 · पुस्तक पृ. 779रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाददोहा / सोरठा 81/1 के शब्दार्थतब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→10पाठ संदर्भ 6.9 · पुस्तक पृ. 780रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाददोहा / सोरठा 91/1 के शब्दार्थकहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→11पाठ संदर्भ 6.1 · पुस्तक पृ. 781रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाददोहा / सोरठा 101/1 के शब्दार्थयह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→12पाठ संदर्भ 6.11 · पुस्तक पृ. 782सुबेलपर श्रीरामजीकी झाँकी और चन्द्रोदयवर्णनदोहा / सोरठा 11 (क), 11 (ख)2/2 के शब्दार्थइहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→13पाठ संदर्भ 6.12 · पुस्तक पृ. 782–783सुबेलपर श्रीरामजीकी झाँकी और चन्द्रोदयवर्णनदोहा / सोरठा 12 (क), 12 (ख)2/2 के शब्दार्थपूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→14पाठ संदर्भ 6.13 · पुस्तक पृ. 784श्रीरामजीके बाणसे रावणके मुकुट-छत्रादिका गिरनादोहा / सोरठा 13 (क), 13 (ख)2/2 के शब्दार्थदेखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→15पाठ संदर्भ 6.14 · पुस्तक पृ. 785मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहनादोहा / सोरठा 141/1 के शब्दार्थकंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→16पाठ संदर्भ 6.15 · पुस्तक पृ. 785–786मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहनादोहा / सोरठा 15 (क), 15 (ख)2/2 के शब्दार्थपद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→17पाठ संदर्भ 6.16 · पुस्तक पृ. 786–787मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहनादोहा / सोरठा 16 (क), 16 (ख)2/2 के शब्दार्थबिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→18पाठ संदर्भ 6.17 · पुस्तक पृ. 787–788मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहनादोहा / सोरठा 17 (क), 17 (ख)2/2 के शब्दार्थइहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→19पाठ संदर्भ 6.18 · पुस्तक पृ. 788–789अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाददोहा / सोरठा 181/1 के शब्दार्थबंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→20पाठ संदर्भ 6.19 · पुस्तक पृ. 789–790अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाददोहा / सोरठा 191/1 के शब्दार्थतुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→21पाठ संदर्भ 6.2 · पुस्तक पृ. 790–791अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाददोहा / सोरठा 201/1 के शब्दार्थकह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→22पाठ संदर्भ 6.21 · पुस्तक पृ. 791–792अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाददोहा / सोरठा 211/1 के शब्दार्थरे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→23पाठ संदर्भ 6.22 · पुस्तक पृ. 792अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाददोहा / सोरठा 22 (क), 22 (ख)2/2 के शब्दार्थसिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→24पाठ संदर्भ 6.23 · पुस्तक पृ. 793–794अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाददोहा / सोरठा 23 (क), 23 (ख), 23 (ग), 23 (घ), 23 (ङ), 23 (छ)6/6 के शब्दार्थतुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→25पाठ संदर्भ 6.24 · पुस्तक पृ. 794–796अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाददोहा / सोरठा 241/1 के शब्दार्थधन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।।AI अर्थ सहेजे गए · 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