← मुखपृष्ठ पर लौटें

काण्ड 4

किष्किन्धाकाण्ड

31 पाठ के अंश · श्लोक, चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद

शब्दार्थ के साथ पढ़ना शुरू करें →

शब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं। विद्वान की समीक्षा बाकी है।

3,668 / 3,668 शब्दों के AI अर्थ उपलब्ध

32 / 32 क्रमांकित दोहा / सोरठा के पूरे शब्दार्थ उपलब्ध

विषय-सूची

31

प्रसंग पुस्तक की विषय-सूची से हैं। पृष्ठों से मिलान अनुमानित है; एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं। दोहा / सोरठा की संख्या मूल पाठ से ली गई है।

01पाठ संदर्भ मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 681–682मंगलाचरणदोहा / सोरठा: इस अंश में नहींश्रीगणेशाय नमः।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी02पाठ संदर्भ 4.1 · पुस्तक पृ. 682–683श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रतादोहा / सोरठा 11/1 के शब्दार्थआगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी03पाठ संदर्भ 4.2 · पुस्तक पृ. 683–684श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रतादोहा / सोरठा 21/1 के शब्दार्थकोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी04पाठ संदर्भ 4.3 · पुस्तक पृ. 684श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रतादोहा / सोरठा 31/1 के शब्दार्थजदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी05पाठ संदर्भ 4.4 · पुस्तक पृ. 685श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रतादोहा / सोरठा 41/1 के शब्दार्थदेखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी06पाठ संदर्भ 4.5 · पुस्तक पृ. 685–686श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रतादोहा / सोरठा 51/1 के शब्दार्थकीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी07पाठ संदर्भ 4.6 · पुस्तक पृ. 686–687सुग्रीवका दु:ख सुनाना, बालिवधकी प्रतिज्ञा, श्रीरामजीका मित्र-लक्षण-वर्णनदोहा / सोरठा 61/1 के शब्दार्थनात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी08पाठ संदर्भ 4.7 · पुस्तक पृ. 687–690सुग्रीवका दु:ख सुनाना, बालिवधकी प्रतिज्ञा, श्रीरामजीका मित्र-लक्षण-वर्णन · सुग्रीवका वैराग्यदोहा / सोरठा 71/1 के शब्दार्थजे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी09पाठ संदर्भ 4.8 · पुस्तक पृ. 690–691बालि-सुग्रीव-युद्ध, बालि-उद्धारदोहा / सोरठा 81/1 के शब्दार्थअस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी10पाठ संदर्भ 4.9 · पुस्तक पृ. 691बालि-सुग्रीव-युद्ध, बालि-उद्धारदोहा / सोरठा 91/1 के शब्दार्थपरा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी11पाठ संदर्भ 4.1 · पुस्तक पृ. 692बालि-सुग्रीव-युद्ध, बालि-उद्धारदोहा / सोरठा 101/1 के शब्दार्थसुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी12पाठ संदर्भ 4.11 · पुस्तक पृ. 693–694ताराका विलाप, ताराको श्रीरामजी-द्वारा उपदेश और सुग्रीवका राज्याभिषेक तथा अंगदको युवराजपददोहा / सोरठा 111/1 के शब्दार्थराम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी13पाठ संदर्भ 4.12 · पुस्तक पृ. 694ताराका विलाप, ताराको श्रीरामजी-द्वारा उपदेश और सुग्रीवका राज्याभिषेक तथा अंगदको युवराजपददोहा / सोरठा 121/1 के शब्दार्थउमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी14पाठ संदर्भ 4.13 · पुस्तक पृ. 695वर्षा-ऋतु-वर्णनदोहा / सोरठा 131/1 के शब्दार्थसुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी15पाठ संदर्भ 4.14 · पुस्तक पृ. 695–696वर्षा-ऋतु-वर्णनदोहा / सोरठा 141/1 के शब्दार्थघन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी16पाठ संदर्भ 4.15 · पुस्तक पृ. 696–697वर्षा-ऋतु-वर्णनदोहा / सोरठा 15 (क), 15 (ख)2/2 के शब्दार्थदादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी17पाठ संदर्भ 4.16 · पुस्तक पृ. 697–698शरद्-ऋतु-वर्णनदोहा / सोरठा 161/1 के शब्दार्थबरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी18पाठ संदर्भ 4.17 · पुस्तक पृ. 698–699शरद्-ऋतु-वर्णनदोहा / सोरठा 171/1 के शब्दार्थसुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी19पाठ संदर्भ 4.18 · पुस्तक पृ. 699–700श्रीरामकी सुग्रीवपर नाराजी, लक्ष्मणजीका कोपदोहा / सोरठा 181/1 के शब्दार्थबरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी20पाठ संदर्भ 4.19 · पुस्तक पृ. 700श्रीरामकी सुग्रीवपर नाराजी, लक्ष्मणजीका कोपदोहा / सोरठा 191/1 के शब्दार्थइहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी21पाठ संदर्भ 4.2 · पुस्तक पृ. 701सुग्रीव-राम-संवाद और सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका प्रस्थानदोहा / सोरठा 201/1 के शब्दार्थचरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी22पाठ संदर्भ 4.21 · पुस्तक पृ. 701–702सुग्रीव-राम-संवाद और सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका प्रस्थानदोहा / सोरठा 211/1 के शब्दार्थनाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी23पाठ संदर्भ 4.22 · पुस्तक पृ. 702–703सुग्रीव-राम-संवाद और सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका प्रस्थानदोहा / सोरठा 221/1 के शब्दार्थबानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी24पाठ संदर्भ 4.23 · पुस्तक पृ. 703–704सुग्रीव-राम-संवाद और सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका प्रस्थानदोहा / सोरठा 231/1 के शब्दार्थसुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी25पाठ संदर्भ 4.24 · पुस्तक पृ. 704–705सुग्रीव-राम-संवाद और सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका प्रस्थान · गुफामें तपस्विनीके दर्शनदोहा / सोरठा 241/1 के शब्दार्थकतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी