काण्ड 1
बालकाण्ड
362 पाठ के अंश · श्लोक, चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद
शब्दार्थ के साथ पढ़ना शुरू करें →शब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं। विद्वान की समीक्षा बाकी है।
36,968 / 36,969 शब्दों के AI अर्थ उपलब्ध
395 / 395 क्रमांकित दोहा / सोरठा के पूरे शब्दार्थ उपलब्ध
विषय-सूची
362प्रसंग पुस्तक की विषय-सूची से हैं। पृष्ठों से मिलान अनुमानित है; एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं। दोहा / सोरठा की संख्या मूल पाठ से ली गई है।
01पाठ संदर्भ मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 17–19मंगलाचरणदोहा / सोरठा 1, 2, 3, 4, 55/5 के शब्दार्थश्रीगणेशाय नमः।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→02पाठ संदर्भ 1.1 · पुस्तक पृ. 19–20गुरु-वन्दनादोहा / सोरठा 11/1 के शब्दार्थबंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→03पाठ संदर्भ 1.2 · पुस्तक पृ. 20–21ब्राह्मण-संत-वन्दनादोहा / सोरठा 21/1 के शब्दार्थगुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→04पाठ संदर्भ 1.3 · पुस्तक पृ. 21–23ब्राह्मण-संत-वन्दनादोहा / सोरठा 3 (क), 3 (ख)2/2 के शब्दार्थमज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→05पाठ संदर्भ 1.4 · पुस्तक पृ. 23–24खल-वन्दनादोहा / सोरठा 41/1 के शब्दार्थबहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→06पाठ संदर्भ 1.5 · पुस्तक पृ. 24–25संत-असंत-वन्दनादोहा / सोरठा 51/1 के शब्दार्थमैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→07पाठ संदर्भ 1.6 · पुस्तक पृ. 25–26संत-असंत-वन्दनादोहा / सोरठा 61/1 के शब्दार्थखल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→08पाठ संदर्भ 1.7 · पुस्तक पृ. 26–27संत-असंत-वन्दना · रामरूपसे जीवमात्रकी वन्दनादोहा / सोरठा 7 (क), 7 (ख), 7 (ग), 7 (घ)4/4 के शब्दार्थअस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→09पाठ संदर्भ 1.8 · पुस्तक पृ. 28–29तुलसीदासजीकी दीनता और रामभक्तिमयी कविताकी महिमादोहा / सोरठा 81/1 के शब्दार्थआकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→10पाठ संदर्भ 1.9 · पुस्तक पृ. 29–30तुलसीदासजीकी दीनता और रामभक्तिमयी कविताकी महिमादोहा / सोरठा 91/1 के शब्दार्थखल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→11पाठ संदर्भ 1.1 · पुस्तक पृ. 30–31तुलसीदासजीकी दीनता और रामभक्तिमयी कविताकी महिमादोहा / सोरठा 10 (क), 10 (ख)2/2 के शब्दार्थएहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→12पाठ संदर्भ 1.11 · पुस्तक पृ. 32तुलसीदासजीकी दीनता और रामभक्तिमयी कविताकी महिमादोहा / सोरठा 111/1 के शब्दार्थमनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→13पाठ संदर्भ 1.12 · पुस्तक पृ. 33तुलसीदासजीकी दीनता और रामभक्तिमयी कविताकी महिमादोहा / सोरठा 121/1 के शब्दार्थजे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→14पाठ संदर्भ 1.13 · पुस्तक पृ. 34–35तुलसीदासजीकी दीनता और रामभक्तिमयी कविताकी महिमादोहा / सोरठा 131/1 के शब्दार्थसब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→15पाठ संदर्भ 1.14 · पुस्तक पृ. 35–37कवि-वन्दना · वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदिकी वन्दनादोहा / सोरठा 14 (क), 14 (ख), 14 (ग), 14 (घ), 14 (ङ), 14 (च), 14 (छ)7/7 के शब्दार्थएहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→16पाठ संदर्भ 1.15 · पुस्तक पृ. 37–38वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदिकी वन्दनादोहा / सोरठा 151/1 के शब्दार्थपुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→17पाठ संदर्भ 1.16 · पुस्तक पृ. 38–39श्रीसीताराम-धाम-परिकर-वन्दनादोहा / सोरठा 161/1 के शब्दार्थबंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→18पाठ संदर्भ 1.17 · पुस्तक पृ. 39–40श्रीसीताराम-धाम-परिकर-वन्दनादोहा / सोरठा 171/1 के शब्दार्थप्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→19पाठ संदर्भ 1.18 · पुस्तक पृ. 40श्रीसीताराम-धाम-परिकर-वन्दनादोहा / सोरठा 181/1 के शब्दार्थकपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→20पाठ संदर्भ 1.19 · पुस्तक पृ. 41श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमादोहा / सोरठा 191/1 के शब्दार्थबंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→21पाठ संदर्भ 1.2 · पुस्तक पृ. 42श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमादोहा / सोरठा 201/1 के शब्दार्थआखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→22पाठ संदर्भ 1.21 · पुस्तक पृ. 43श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमादोहा / सोरठा 211/1 के शब्दार्थसमुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→23पाठ संदर्भ 1.22 · पुस्तक पृ. 43–44श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमादोहा / सोरठा 221/1 के शब्दार्थनाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→24पाठ संदर्भ 1.23 · पुस्तक पृ. 45श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमादोहा / सोरठा 231/1 के शब्दार्थअगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→25पाठ संदर्भ 1.24 · पुस्तक पृ. 45–46श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमादोहा / सोरठा 241/1 के शब्दार्थराम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→