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काण्ड 2

अयोध्याकाण्ड

327 पाठ के अंश · श्लोक, चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद

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शब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं। विद्वान की समीक्षा बाकी है।

31,193 / 31,289 शब्दों के AI अर्थ उपलब्ध

324 / 325 क्रमांकित दोहा / सोरठा के पूरे शब्दार्थ उपलब्ध

विषय-सूची

327

प्रसंग पुस्तक की विषय-सूची से हैं। पृष्ठों से मिलान अनुमानित है; एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं। दोहा / सोरठा की संख्या मूल पाठ से ली गई है।

01पाठ संदर्भ मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 343मंगलाचरणदोहा / सोरठा: इस अंश में नहींश्रीगणेशाय नमः।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी02पाठ संदर्भ 2.1 · पुस्तक पृ. 344मंगलाचरणदोहा / सोरठा 11/1 के शब्दार्थजब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी03पाठ संदर्भ 2.2 · पुस्तक पृ. 345मंगलाचरणदोहा / सोरठा 21/1 के शब्दार्थएक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी04पाठ संदर्भ 2.3 · पुस्तक पृ. 345–346मंगलाचरणदोहा / सोरठा 31/1 के शब्दार्थकहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी05पाठ संदर्भ 2.4 · पुस्तक पृ. 346–347मंगलाचरणदोहा / सोरठा 41/1 के शब्दार्थसब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी06पाठ संदर्भ 2.5 · पुस्तक पृ. 347–348मंगलाचरणदोहा / सोरठा 51/1 के शब्दार्थमुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी07पाठ संदर्भ 2.6 · पुस्तक पृ. 348रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थनादोहा / सोरठा 61/1 के शब्दार्थहरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी08पाठ संदर्भ 2.7 · पुस्तक पृ. 349रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थनादोहा / सोरठा 71/1 के शब्दार्थजो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी09पाठ संदर्भ 2.8 · पुस्तक पृ. 349–350रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थनादोहा / सोरठा 81/1 के शब्दार्थप्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी10पाठ संदर्भ 2.9 · पुस्तक पृ. 350–351रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थनादोहा / सोरठा 91/1 के शब्दार्थतब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी11पाठ संदर्भ 2.1 · पुस्तक पृ. 351–352रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थनादोहा / सोरठा 101/1 के शब्दार्थबरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी12पाठ संदर्भ 2.11 · पुस्तक पृ. 352–353रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थनादोहा / सोरठा 111/1 के शब्दार्थबाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी13पाठ संदर्भ 2.12 · पुस्तक पृ. 353सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 121/1 के शब्दार्थसुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी14पाठ संदर्भ 2.13 · पुस्तक पृ. 354सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 131/1 के शब्दार्थदीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी15पाठ संदर्भ 2.14 · पुस्तक पृ. 354–355सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 141/1 के शब्दार्थकत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी16पाठ संदर्भ 2.15 · पुस्तक पृ. 355–356सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 151/1 के शब्दार्थप्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी17पाठ संदर्भ 2.16 · पुस्तक पृ. 356–357सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 161/1 के शब्दार्थएकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी18पाठ संदर्भ 2.17 · पुस्तक पृ. 357–358सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 171/1 के शब्दार्थसादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी19पाठ संदर्भ 2.18 · पुस्तक पृ. 358–359सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 181/1 के शब्दार्थचतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी20पाठ संदर्भ 2.19 · पुस्तक पृ. 359सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 191/1 के शब्दार्थभावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी21पाठ संदर्भ 2.2 · पुस्तक पृ. 360सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 201/1 के शब्दार्थकैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी22पाठ संदर्भ 2.21 · पुस्तक पृ. 360–361सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 211/1 के शब्दार्थनैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी23पाठ संदर्भ 2.22 · पुस्तक पृ. 361–362सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाददोहा / सोरठा 221/1 के शब्दार्थकुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी24पाठ संदर्भ 2.23 · पुस्तक पृ. 362–363कैकेयीका कोपभवनमें जानादोहा / सोरठा 231/1 के शब्दार्थकुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी25पाठ संदर्भ 2.24 · पुस्तक पृ. 363कैकेयीका कोपभवनमें जानादोहा / सोरठा 241/1 के शब्दार्थबाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी