काण्ड 3
अरण्यकाण्ड
47 पाठ के अंश · श्लोक, चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद
शब्दार्थ के साथ पढ़ना शुरू करें →शब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं। विद्वान की समीक्षा बाकी है।
6,508 / 6,788 शब्दों के AI अर्थ उपलब्ध
53 / 55 क्रमांकित दोहा / सोरठा के पूरे शब्दार्थ उपलब्ध
विषय-सूची
47प्रसंग पुस्तक की विषय-सूची से हैं। पृष्ठों से मिलान अनुमानित है; एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं। दोहा / सोरठा की संख्या मूल पाठ से ली गई है।
01पाठ संदर्भ मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 619–620मंगलाचरणदोहा / सोरठा: इस अंश में नहींश्रीगणेशाय नमः।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→02पाठ संदर्भ 3.1 · पुस्तक पृ. 620जयन्तकी कुटिलता और फलप्राप्तिदोहा / सोरठा 11/1 के शब्दार्थपुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→03पाठ संदर्भ 3.2 · पुस्तक पृ. 621–622जयन्तकी कुटिलता और फलप्राप्तिदोहा / सोरठा 21/1 के शब्दार्थप्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→04पाठ संदर्भ 3.3 · पुस्तक पृ. 622–623अत्रि-मिलन एवं स्तुतिदोहा / सोरठा 31/1 के शब्दार्थरघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→05पाठ संदर्भ 3.4 · पुस्तक पृ. 623–624अत्रि-मिलन एवं स्तुतिदोहा / सोरठा 41/1 के शब्दार्थनमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→06पाठ संदर्भ 3.5 · पुस्तक पृ. 625–627श्रीसीता-अनसूया-मिलन और श्रीसीताजीको अनसूयाजीका पातिव्रतधर्म कहनादोहा / सोरठा 5 (क), 5 (ख)2/2 के शब्दार्थअनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→07पाठ संदर्भ 3.6 · पुस्तक पृ. 627–628श्रीसीता-अनसूया-मिलन और श्रीसीताजीको अनसूयाजीका पातिव्रतधर्म कहनादोहा / सोरठा 6 (क), 6 (ख)2/2 के शब्दार्थसुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→08पाठ संदर्भ 3.7 · पुस्तक पृ. 628–629श्रीरामजीका आगे प्रस्थान, विराध-वध और शरभङ्ग-प्रसङ्गदोहा / सोरठा 71/1 के शब्दार्थमुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→09पाठ संदर्भ 3.8 · पुस्तक पृ. 629–630श्रीरामजीका आगे प्रस्थान, विराध-वध और शरभङ्ग-प्रसङ्गदोहा / सोरठा 81/1 के शब्दार्थकह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→10पाठ संदर्भ 3.9 · पुस्तक पृ. 630राक्षस-वधकी प्रतिज्ञा करनादोहा / सोरठा 91/1 के शब्दार्थअस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→11पाठ संदर्भ 3.1 · पुस्तक पृ. 631–633सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलनदोहा / सोरठा 101/1 के शब्दार्थमुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→12पाठ संदर्भ 3.11 · पुस्तक पृ. 633–635सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलनदोहा / सोरठा 111/1 के शब्दार्थकह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→13पाठ संदर्भ 3.12 · पुस्तक पृ. 635–636सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलनदोहा / सोरठा 121/1 के शब्दार्थएवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→14पाठ संदर्भ 3.13 · पुस्तक पृ. 637–638सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलनदोहा / सोरठा 131/1 के शब्दार्थतब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→15पाठ संदर्भ 3.14 · पुस्तक पृ. 638–639पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-लक्ष्मण-संवाददोहा / सोरठा 141/1 के शब्दार्थजब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→16पाठ संदर्भ 3.15 · पुस्तक पृ. 639–640पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-लक्ष्मण-संवाददोहा / सोरठा 151/1 के शब्दार्थथोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→17पाठ संदर्भ 3.16 · पुस्तक पृ. 640–641पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-लक्ष्मण-संवाददोहा / सोरठा 161/1 के शब्दार्थधर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→18पाठ संदर्भ 3.17 · पुस्तक पृ. 641–643शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका खर-दूषणके पास जाना और खर-दूषणादिका वधदोहा / सोरठा 171/1 के शब्दार्थभगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→19पाठ संदर्भ 3.18 · पुस्तक पृ. 643–644शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका खर-दूषणके पास जाना और खर-दूषणादिका वधदोहा / सोरठा 181/1 के शब्दार्थनाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→20पाठ संदर्भ 3.19 · पुस्तक पृ. 645–646शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका खर-दूषणके पास जाना और खर-दूषणादिका वधदोहा / सोरठा 19 (क), 19 (ख)2/2 के शब्दार्थप्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→21पाठ संदर्भ 3.2 · पुस्तक पृ. 646–648शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका खर-दूषणके पास जाना और खर-दूषणादिका वधदोहा / सोरठा 20 (क), 20 (ख)2/2 के शब्दार्थतब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→22पाठ संदर्भ 3.21 · पुस्तक पृ. 649–650शूर्पणखाका रावणके निकट जाना, श्रीसीताजीका अग्रि-प्रवेश और माया-सीतादोहा / सोरठा 21 (क), 21 (ख)2/2 के शब्दार्थजब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→23पाठ संदर्भ 3.22 · पुस्तक पृ. 650–651शूर्पणखाका रावणके निकट जाना, श्रीसीताजीका अग्रि-प्रवेश और माया-सीतादोहा / सोरठा 221/1 के शब्दार्थसुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→24पाठ संदर्भ 3.23 · पुस्तक पृ. 651–652शूर्पणखाका रावणके निकट जाना, श्रीसीताजीका अग्रि-प्रवेश और माया-सीतादोहा / सोरठा 231/1 के शब्दार्थसुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→25पाठ संदर्भ 3.24 · पुस्तक पृ. 652–653मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें मारीचका मारा जानादोहा / सोरठा 241/1 के शब्दार्थसुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→