काण्ड 5
सुन्दरकाण्ड
61 पाठ के अंश · श्लोक, चौपाई, दोहा, सोरठा और छंद
शब्दार्थ के साथ पढ़ना शुरू करें →शब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं। विद्वान की समीक्षा बाकी है।
6,320 / 6,414 शब्दों के AI अर्थ उपलब्ध
62 / 63 क्रमांकित दोहा / सोरठा के पूरे शब्दार्थ उपलब्ध
विषय-सूची
61प्रसंग पुस्तक की विषय-सूची से हैं। पृष्ठों से मिलान अनुमानित है; एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं। दोहा / सोरठा की संख्या मूल पाठ से ली गई है।
01पाठ संदर्भ मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 713–714मंगलाचरणदोहा / सोरठा: इस अंश में नहींश्रीगणेशाय नमः।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→02पाठ संदर्भ 5.1 · पुस्तक पृ. 714–715हनुमान्जीका लङ्काको प्रस्थान, सुरसासे भेंट, छाया पकड़नेवाली राक्षसीका वधदोहा / सोरठा 11/1 के शब्दार्थजामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→03पाठ संदर्भ 5.2 · पुस्तक पृ. 715–716हनुमान्जीका लङ्काको प्रस्थान, सुरसासे भेंट, छाया पकड़नेवाली राक्षसीका वधदोहा / सोरठा 21/1 के शब्दार्थजात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→04पाठ संदर्भ 5.3 · पुस्तक पृ. 716–718लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेशदोहा / सोरठा 31/1 के शब्दार्थनिसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→05पाठ संदर्भ 5.4 · पुस्तक पृ. 718लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेशदोहा / सोरठा 40/1 के शब्दार्थमसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।AI अर्थ अभी उपलब्ध नहीं→06पाठ संदर्भ 5.5 · पुस्तक पृ. 719लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेशदोहा / सोरठा 51/1 के शब्दार्थप्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→07पाठ संदर्भ 5.6 · पुस्तक पृ. 719–720लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेशदोहा / सोरठा 61/1 के शब्दार्थलंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→08पाठ संदर्भ 5.7 · पुस्तक पृ. 720–721हनुमान्-विभीषण-संवाददोहा / सोरठा 71/1 के शब्दार्थसुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→09पाठ संदर्भ 5.8 · पुस्तक पृ. 721–722हनुमान्-विभीषण-संवाददोहा / सोरठा 81/1 के शब्दार्थजानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→10पाठ संदर्भ 5.9 · पुस्तक पृ. 722–723हनुमान्जीका अशोकवाटिकामें सीताको देखकर दु:खी होना और रावणका सीताजीको भय दिखलानादोहा / सोरठा 91/1 के शब्दार्थतरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→11पाठ संदर्भ 5.1 · पुस्तक पृ. 723–724हनुमान्जीका अशोकवाटिकामें सीताको देखकर दु:खी होना और रावणका सीताजीको भय दिखलानादोहा / सोरठा 101/1 के शब्दार्थसीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→12पाठ संदर्भ 5.11 · पुस्तक पृ. 724श्रीसीता-त्रिजटा-संवाददोहा / सोरठा 111/1 के शब्दार्थत्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→13पाठ संदर्भ 5.12 · पुस्तक पृ. 724–725श्रीसीता-त्रिजटा-संवाददोहा / सोरठा 121/1 के शब्दार्थत्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→14पाठ संदर्भ 5.13 · पुस्तक पृ. 726–727श्रीसीता-हनुमान्-संवाददोहा / सोरठा 131/1 के शब्दार्थतब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→15पाठ संदर्भ 5.14 · पुस्तक पृ. 727–728श्रीसीता-हनुमान्-संवाददोहा / सोरठा 141/1 के शब्दार्थहरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→16पाठ संदर्भ 5.15 · पुस्तक पृ. 728श्रीसीता-हनुमान्-संवाददोहा / सोरठा 151/1 के शब्दार्थकहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→17पाठ संदर्भ 5.16 · पुस्तक पृ. 729श्रीसीता-हनुमान्-संवाददोहा / सोरठा 161/1 के शब्दार्थजौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→18पाठ संदर्भ 5.17 · पुस्तक पृ. 730हनुमान्जीद्वारा अशोकवाटिका-विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और मेघनादका हनुमान्जीको नागपाशमें बाँधकर सभामें ले जानादोहा / सोरठा 171/1 के शब्दार्थमन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→19पाठ संदर्भ 5.18 · पुस्तक पृ. 730–731हनुमान्जीद्वारा अशोकवाटिका-विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और मेघनादका हनुमान्जीको नागपाशमें बाँधकर सभामें ले जानादोहा / सोरठा 181/1 के शब्दार्थचलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→20पाठ संदर्भ 5.19 · पुस्तक पृ. 731–732हनुमान्जीद्वारा अशोकवाटिका-विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और मेघनादका हनुमान्जीको नागपाशमें बाँधकर सभामें ले जानादोहा / सोरठा 191/1 के शब्दार्थसुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→21पाठ संदर्भ 5.2 · पुस्तक पृ. 732–733हनुमान्जीद्वारा अशोकवाटिका-विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और मेघनादका हनुमान्जीको नागपाशमें बाँधकर सभामें ले जानादोहा / सोरठा 201/1 के शब्दार्थब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→22पाठ संदर्भ 5.21 · पुस्तक पृ. 733–734हनुमान्-रावण-संवाददोहा / सोरठा 211/1 के शब्दार्थकह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→23पाठ संदर्भ 5.22 · पुस्तक पृ. 734–735हनुमान्-रावण-संवाददोहा / सोरठा 221/1 के शब्दार्थजानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→24पाठ संदर्भ 5.23 · पुस्तक पृ. 735हनुमान्-रावण-संवाददोहा / सोरठा 231/1 के शब्दार्थराम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→25पाठ संदर्भ 5.24 · पुस्तक पृ. 736हनुमान्-रावण-संवाददोहा / सोरठा 241/1 के शब्दार्थजदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।AI अर्थ सहेजे गए · समीक्षा बाकी→